करोड़ों घरों में बेरोज़गारी के कारण यह भी नहीं हुआ. उनके बच्चों के नाम स्कूल से कट गए. बैंक वालों ने धावा बोल दिया और घर चलाने के लाले पड़ गए, 2020 जाने वाला नहीं: Ravish

रवीश कुमार के इस ब्लॉग में जो लिखा है उसे पढ़कर दिल दहल जाएगा

इतनी भी बेरुख़ी से विदा न कीजिए 2020 को, जाने वाला नहीं है

इस साल की फ़ाइलों में न जाने कितने अपनों के तड़प कर मर जाने के किस्से दर्ज हैं. अस्पतालों के आगे गिड़गिड़ाते हुए लोगों की बेबसी दर्ज है. रास्ते में दम तोड़ने और अस्पताल पहुंच कर दम तोड़ने के किस्से दर्ज हैं. लोग अपनों को आख़िरी बार के लिए नहीं देख सके. उनके क़रीब नहीं जा सके. हमने अस्पतालों को उसी हाल पर छोड़ दिया है जो हाल 2020 के आने के पहले था. राजनीति के मायाजाल में बीमा योजनाएं भलें मुनाफ़े का सौदा हों मगर अस्पतालों के भीतरी ढांचे के विकास पर बात नहीं हो सकी. उन्हें मज़बूत करने के आधे-अधूरे इंतज़ाम किए गए. डाक्टरों ने इन सवालों को दफ़्न कर दिया था. दवा कंपनियों के फेर में मुनाफ़े की ज़िंदगी ने उन्हें भी बेबस कर दिया. अस्पताल के सिस्टम में जितना लाचार मरीज़ था उतना ही डॉक्टर था. यही तो बताने आया था 2020 कि आप दोनों की ज़िंदगी ख़तरे में है. क्या उन ख़तरों से लड़ने के लिए आपने कुछ किया, कुछ होता हुआ देख रहे हैं?क्या हमने इन सवालों के जवाब ढूंढ लिए हैं? अगर नहीं तो फिर 2020 कैसे चला जाएगा?

नव-उदारवाद के दौर में पढ़ने लिखने और शोध के संस्थानों पर सरकारों ने ध्यान देना बंद कर दिया. जब दुनिया के बड़े विश्वविद्यालय इस महामारी को लेकर रोज़ नए-नए शोध जारी कर रहे थे, दवाओं को लेकर रिसर्च कर रहे थे तब भारत के किसी विश्वविद्यालय का आपने नाम सुना था? विश्वगुरु बनेंगे? 2020 यही बताने आया था कि मानवता को अगर किसी ऐसे ख़तरे से बचाना है तो विश्वविद्यालयों और उनकी प्रयोगशालाओं को फिर से खड़ा करना होगा. क्या इस दिशा में ऐसा कुछ हुआ है?

हमारे घर बदल गए. बैठकख़ाना किसी काम का नहीं रहा. पर्दे, सोफ़े, मेज़ और सजावटी सामान मेहमान के इंतज़ार में धूल खाते रहे. हर कमरे में दफ़्तर का एक कोना बन गया है. स्कूल खुल गया है. आप जिस घर को छोड़ शहर में मारे-मारे फिरते थे अब आप शहर को छोड़ घर में मारे-मारे फिर रहे हैं. करोड़ों घरों में बेरोज़गारी के कारण यह भी नहीं हुआ. उनके बच्चों के नाम स्कूल से कट गए. बैंक वालों ने धावा बोल दिया और घर चलाने के लाले पड़ गए. मिलने वाले दो लोगों के बीच एक तीसरा हर वक्त मौजूद रहता है. मास्क पहन लेने और उसके सरक जाने के बीच एक अनजान महामारी इंतज़ार कर रही होती है. किसी से लिपट कर रोने का भी दौर चला गया. करोड़ों लोग अभी भी महामारी से ठीक होने के बाद उससे जूझ रहे हैं. करोड़ों पर महामारी की आशंका बरक़रार है. आप कहते हैं कि साल जा रहा है, क्या नए साल में वो सब वापस आ रहा है?

यह साल हमसे विनम्रता का आग्रह करता है. यह साल अहंकारों को सहमे हुए देखने का साल था. जिन बातों के लिए आगाह करने 2020 आया था उसने 2021 से यही कहा है कि तुम बेशक आओ लेकिन मैं जाने वाला नहीं. ज़िंदगी को तारीख़ों की पटरी से उतार कर जीने लायक बनाने के फ़ैसले जब तक नहीं होंगे, 2020 विदा करने से विदा होने वाला साल नहीं है.

तब क्या नए साल का स्वागत नहीं किया जाए? जश्न न मनाया जाए? ओंकारा के गाने पर डांस न किया जाए? कीजिए न. इसी में जीना भी तो है लेकिन जीने को बेहतर बनाने के रास्ते भी बदलने होंगे. नए सपने देखने होंगे. जो किया नहीं गया. जो किया नहीं जा रहा है. ख़ुद को धोखे में रखने वालों के लिए ही 2021 आ रहा[है वरना जिन्हें अहसास है उन्हें पता है कि 2020 अभी कई साल तक रहेगा.

Ravish Kumar

यह साल कई सालों तक रहने आया है. तरक्की के जिन रास्तों पर दुनिया चली जा रही थी उसके सफ़र के लिए कुछ ज़रूरी सामान छूट गए थे. उसी को याद दिलाने आया है 2020.

2020 जा नहीं रहा है. जाएगा भी नहीं. यह साल अपना कैलेंडर लेकर आया है. यह आने वाले कई सालों का साल है. यह साल कई सालों तक रहने आया है. तरक्की के जिन रास्तों पर दुनिया चली जा रही थी उसके सफ़र के लिए कुछ ज़रूरी सामान छूट गए थे. उसी को याद दिलाने आया है 2020. जब तक हम उन सामानों का बंदोबस्त नहीं करेंगे और सबके लिए नहीं करेंगे, ख़ासकर ग़रीबों के लिए नहीं करेंगे ,महामारी की ज़रा सी छींक स्पीड ब्रेक लगा देगी. इसलिए 2020 का साल हमारी पीठ पर बेताल की तरह सवार रहेगा. तभी उतरेगा जब हम उसके सवालों के जवाब खोज कर लाएंगे।

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