आतंकी मसूर अजहर की गिरफ्तारी तक की पूरी कहानी.

समाचार आज तक,  डेस्क :
इसके बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मसूद अजहर के भारत प्रत्यर्पण की गुजारिश भी की, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. 1994 में जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर ने गिरफ्तार किए जाने के बाद पाकिस्तान के दक्षिणपंथी कट्टर धार्मिक संगठनों के बारे में काफी जानकारियां दी थीं.
अजहर ने तब कहा था, ‘मैं भी उनके उद्देश्यों से सहानुभूति रखता था और जब मैं HuM के अमीर मौलाना फज़ल-उल-रहमान खलील से मिला तो उन्होंने मुझे यावर, अफगानिस्तान में एक तरबैत (ट्रेनिंग) में हिस्सा लेने के लिए बुलाया था. शायद मेरा शरीर थोड़ा कमजोर था और शायद मेरी पढ़ाई के चलते भी. मैंने अपनी 40 दिनों की जरूरी ट्रेनिंग भी पूरी नहीं की थी, तभी रहमान-उर-रहमान ने मुझसे HuM की एक मासिक पत्रिका शुरू करने को कहा और अगस्त 1989 के आसपास मैंने सदा-ए-मुजाहिद नाम की एक पत्रिका निकालनी शुरू कर दी.’

इस पत्रिका के जरिए आतंक का प्रसार करता था मसूद अजहर
मसूद अजहर ने कहा, ‘मैं करीब 2000 प्रतियां निकाला करता था और उनमें से ज्यादातर को शुक्रवार की नमाज के बाद या ऐसे ही मौकों पर होने वाली आम सभाओं में फ्री बांटा जाता था. हम इन पत्रिकाओं में अफगानिस्तान में हमारी गतिविधियों, हमारे दूसरे धड़ों की हरकतों और नए खुलने वाले ठिकानों के बारे में जानकारी छापा करते थे.’

पूरी दाढ़ी वालों को आसानी से मिल जाती थी संगठन में जगह
उसने बताया था कि 1990 तक HuM के ठिकाने लगभग सारे ही महत्वपूर्ण इलाकों में खुल चुके थे, जिनमें कराची, हैदराबाद, लाहौर, गुजरांवाला और इस्लामाबाद जैसे शहर शामिल थे. HuM ने ऐसे किसी भी शख्स को अपने संगठन में शामिल होने की छूट दे रखी थी, जिसने अफगानिस्तान में अपनी ट्रेनिंग पूरी की हो, ‘जिये सिंध आंदोलन’ या ‘मोहाजिर कौमी आंदोलन’ से न जुड़ा हो और उसकी पूरी दाढ़ी हो. हालांकि हम न शियाओं को भर्ती करते थे और न ही उन्हें जो देवबंदी नहीं थे.

जब अमेरिका ने बना रखा था पाक को मोहरा
मसूद अजहर ने इसी पूछताछ में बताया था, “1993 में  संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे देशों से करीब 400 आतंकियों को पाकिस्तान सरकार ने पेशावर के पास गिरफ्तार किया था. ऐसा अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते किया गया था. इसके बाद उन्हें पाकिस्तान से बाहर निकाल दिया गया था. हालांकि अरब सरकार के भी कुछ लोग गड़बड़ी के डर से उन्हें वापस नहीं लेना चाहते थे. ऐसे में उनमें से ज्यादातर आतंकी सूडान और सोमालिया चले गए थे, जहां जाकर उन्होंने ‘इत्तेहाद-ए-इस्लामी’ नाम का संगठन ज्वाइन कर लिया था.

इन लोगों ने भी हमसे संपर्क बनाए रखा था. वे वहीं से वहां की मुस्लिम जनता के दर्द हमारे साथ साझा किया करते थे. उन्होंने हमें बताया था कि जहां गड़बड़ी फैली थी, वहां संयुक्त राष्ट्र की सेना के तौर पर पाकिस्तानी दस्ते को शांति स्थापित करने के लिए लगाया गया था ताकि वे अमेरिकियों की जान और माल की रक्षा कर सकें. अगर एक भी अमेरिकी गाड़ी कहीं जाती तो पाकिस्तानी सेना इसकी रक्षा कर रही होती.

ऐसे में इत्तेहाद-ए-इस्लामी इस पशोपेश में था कि कब उसे सीधे अमेरिकियों से उलझने का मौका मिलेगा, जो कि अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योंकि उन्होंने अपने भाईयों का सामना किया है. इसी बीच पाकिस्तानी सेना के अदीब रेडियो स्टेशन पर हमले के दौरान इत्तेहाद-ए-इस्लामी संगठन के कई लड़ाकों की जान गई थी. इसके बाद से पाकिस्तानी, जिन्हें अब तक वे इस्लाम का हीरो मानते थे, उनके लिए स्थितियां उतनी भी आसान नहीं रह गई थीं.

मैंने इन खतों को छापा और नैरोबी में इन लड़ाकों (आतंकियों) से मिलने के लिए पत्रकारों की एक टीम का भी इंतजाम किया. हमारे लौटने के बाद, कई सारी नई कहानियां भी सामने आईं, जिनमें सोमालिया में पाकिस्तानी टुकड़ी के रोल की आलोचना की गई थी. मैंने इस मामले पर पुस्तिका भी छापी थी जिसकी 5,000 कॉपियां बांटी गई थीं.”

मसूद ने यह भी बताया था कि अफगानिस्तान, जम्मू-कश्मीर और दूसरे कई इलाकों में भेजे जाने वाले आतंकियों को मदरसे किस तरह ट्रेनिंग देते हैं.
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