देश का भविष्य हमारे बच्चों को टीकाकरण के बाद स्कूल भेजने के अपने वादे से क्यों मुकरने लगी सरकारें..?:-“सारस”*

*देश का भविष्य हमारे बच्चों को टीकाकरण के बाद स्कूल भेजने के अपने वादे से क्यों मुकरने लगी सरकारें..?:-“सारस”*

*अभिभावक वर्ग हताश और निराश, जिम्मेदार कौन..?*

समाचार आज तक, अमिता, 13 जनवरी;

कोरोना महामारी के दौरान अबतक सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चों की पढ़ाई लिखाई हुई है. देश के कमोबेश अधिकतर राज्यों ने बच्चों के स्कूल को खोलने की दिशा में कदम भी बढाया है. जबकि बच्चों के टीकाकरण और इसके बाद के परिणामों को लेकर अभिभावकों की चिंता को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है l अब इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह तो आनेवाला वक़्त ही तय करेगा,पर इतना तो साफ ही है कि अधिकांश अभिभावक अभी भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हैँ l यह विचार आज तक से एक विशेष बातचीत के दौरान संस्था”सारस”ने साझा किया है l”सारस”के डायरेक्टर एस. के. चौधरी ने वगैर किसी लाग लपेट के सरकार की नियत को कठघड़े में खड़ा करते हुए कहा है की यही सरकार कहती थी की बच्चों को टीका उपलब्ध कराये बिना हम उनकी जान का सौदा नहीं करेंगे क्योंकि यही देश का भविष्य हैँ, फिर अब क्या हो गया l उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल करते हुए निजी स्कूलों पर भी निशाना साधा है l उन्होंने स्पष्ट कहा है कि लॉकडाउन से पहले तक तो स्कूलवाले कहते थे की कि मोबाइल फोन बच्चों के लिए अभिशाप है, फिर फीस वसूलने को लेकर ऑनलाइन पढ़ाई को हीं समय की मांग बता कर इसे बच्चों के लिए वरदान कैसे साबित कर दिया? अब जबकी कई मोबाइल ऐप पर बगैर किसी फीस के हीं बच्चों के लिये बेहतर पठन पाठन क़ी सामग्री उपलब्ध है तो इससे डर कर हीं तो कहीं सरकार पर दबाब नहीं बनाया गया है? पंजाब के शिक्षा मंत्री का यह बयान क़ी स्कूल संचालक चाहते हैँ क़ी बच्चे कम से कम तीन महीने तो स्कूल आकर पढ़ाई करें ताकी उनके सिलेबस के तैयारी क़ी जांच वह कर सकें इन आशंकाओ को बल देता है l निजी स्कूल और सरकार के बीच क़ी यह रस्साकसी मासूम नौनीहालों को किस तरफ ले जायेगी यह सोचकर हीं अभिभावक चिंतित हैँ, और एक हद तक यह जायज हीं हैl

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