जालंधर के एक निजी स्कूल एपीजे ने कानून की उड़ाई धज्जियां, कानून को ठेंगा दिखाते हुए दूसरी क्लास के बच्चे का काटा नाम, प्रशासन ने दिखाई बेरुखी इस खबर को पढ़े सबूतों के साथ

समाचार आज तक, 21 मई जालंधर;( अमिता शर्मा):

लाक डाउन के दौरान जालंधर के एक निजी स्कूल एपीजे ने कानून की उड़ाई धज्जियां कानून को ठेंगा दिखाते हुए दूसरी क्लास के बच्चे का स्कूल से काटा नाम और खबर में नाम काटने की तारीख भी गलत दी गई है ।

जालंधर के एक निजी स्कूल एपीजे जोकि टांडा रोड पर स्थित वहां पर एक बच्चे के स्कूल से नाम काटने का मामला सामने आया है। यह बच्चा शुरू से ही इस स्कूल में पढ़ रहा था । बच्चे के पिता गगन प्रीत सिंह ने बताया कोविड-19 कर्फ्यू के दौरान  स्कूल के कुछ स्टाफ  कर्मचारी बच्चे के घर पर आए  उन्होंने बच्चे के पिता से  बच्चे की फीस मांगी  और कहा कि अगर फीस नहीं दे सकते तो अपना मैटर  close कर लो । गगन ने बताया कि  उसको स्कूल वालों ने  यह भी कहा कि फीस ना देने पर आपके बच्चे का नाम काट दिया जाएगा । और एपीजे स्कूल की ओर से गगन के घर पहुंची दीप्ति कोऑर्डिनेटर और एक अन्य मैनेजमेंट के व्यक्ति ने यह भी कहा कि आपका जो मैटर स्कूल में पुराना चल रहा है उसको खत्म कर दो । इसकी जिसकी शिकायत बच्चे के पिता गगन ने शिक्षा शिक्षा संबंधित हर दफ्तर में  की है दफ्तरों के नाम इस प्रकार हैं।-

  1.  डीईओ दफ्तर
  2. डीसी साहब
  3. डिविजनल कमिश्नर
  4. नेशनल चाइल्ड राइट प्रोटक्शन
  5.  कमीशन बाल अधिकार
  6. नेशनल चाइल्ड राइट प्रोटेक्ट कमीशन भारत
  7. विजेंद्र सिंह एजुकेशन मिनिस्टर
  8. सीएम साहब
  9. प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया

उसके बाद स्कूल प्रिंसिपल की ओर से 2.4 .2020 रात को 11:22 मिनट पर मेल आई कि आपके बच्चे का नाम काट दिया गया है। और साथ में स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट, ड्राफ्ट बच्चे के पैरंट्स को मेल कर दिया और साथ ही 2nd क्लास का रिजल्ट भी मेल किया।देखते हैं इंसाफ कहां से मिलेगा?  बच्चे के पिता माता पिता बहुत परेशान है ।संवैधानिक एवं मौलिक अधिकार से बच्चे को दूर रखने की कोशिश की है।

स्कूल प्रिंसिपल गिरीश कुमार ने कानून को पीछे छोड़ते हुए अपने ही कानून बनाकर बच्चे का काटा नाम

आगे देखिए कानून क्या कहता है ।जिस की कॉपी नीचे दी जा रही है।

डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन अफसर से जब ऑर्डर की कॉपी मांगी तब  उन्होंने कहा कि मैं इंचार्ज नहीं। यह मामला मेरे अंडर नहीं आता है। इसका मतलब यह है कि जो डीईओ इतनी बड़ी पोस्ट पर बैठे हैं उन्हें पता ही नहीं है और क्या-क्या उनके अंडर आता है ।कानून क्या है वह बच्चे को कैसे इंसाफ दिलाएंगे डीईओ जिसके अधीन 11 बलाक के कम से कम 1500 सरकारी और गैर सरकारी स्कूल आते हैं।  जिनको ऑर्डर के बारे में जानकारी ही नहीं है और जानकारी हो भी कैसे उनके पास तो ऑर्डर ही नहीं है उनके अधीन आते स्कूलों में क्या हो रहा है ।

बच्चों के साथ कैसी नाइंसाफी

वह कैसे बच्चों के साथ और बच्चों के मां-बाप के साथ इंसाफ कर पाएगे। और शिक्षा अधिकारी होते हुए शिक्षा के साथ भी क्या इंसाफ कर पाएंगे ।

22.7.2019 को प्रिंसिपल सेक्टरी की ओर से डिविजनल कमिश्नर को एक लेटर भी भेजी गई थी जिसमें एनुअल चार्जेस के डिटेल्स फीस की डिटेल बताई जाए कि साल बाद जो फीस बढ़ाई जा रही है वह किस चीज के चार्जेस है स्कूल में जो बुक दी जाती है उसके बारे में बताया जाए फीस जमा कराने के बाद रसीद नहीं दी जाती उस पर भी सवाल खड़ा किया है प्रिंसिपल सेक्टरी ने। 

दूसरी तरफ नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन भी यह कह रहा है कि यह कानून की सरासर उल्लंघन है । डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन अफसर हरिंदर पाल सिंह यह बात कह रहे हैं कि कानून है बच्चे का नाम काटा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन द्वारा नाम काटने को लेकर साफ-साफ लिखा है कि यह 2005 एक्ट सेक्शन 13 की उल्लंघना है । जिसमें Su – Moto नोटिस लिखकर 10 दिन के अंदर डीसी जालंधर को भेजा है । जिसका 10 दिन में जवाब मांगा गया है इसमें बड़ा सवाल यह है कि क्या नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन डीसी को भेजा गया शो कॉज नोटिस इससे यह सवाल खड़ा होता है क्या नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन गलत है या सही है या डी ओ साहब सही है यह लेटर नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन की ओर से 10.4.2020 को डीसी जालंधर  को भेजी गई।

क्या डियो जालंधर उस नोटिस को गलत ठहरा सकते हैं। या अपने आप कोई नया कानून बनाएंगे या यह जो कानून है इनका अपना है डी ओ साहब अभी तक कोई भी ऐसी सरकारी लेटर नहीं पेश कर पाए जिसमें यह लिखा हो की फीस ना देने की वजह से बच्चे का स्कूल से नाम  काटा जा सकता है ।

डियो जालंधर से  2 दिन से बार-बार ऑर्डर की कॉपी मांगी जा रही थी ।कोई भी ऐसा कानून या कोई भी ऑर्डर की कॉपी  कॉपी खबर लिखने तक नहीं दे पाए। जिसमें फीस की वजह से स्कूल से नाम काटा जाए।

RTE Act की धारा 16 के मुताबिक (2010)  की बात करें तो उसमें साफ-साफ लिखा है…….

6 साल से 14 साल के बच्चे को पढ़ाई से किसी भी हाल में अलग नहीं रखा जा सकता। इस तरह के मुताबिक किसी भी बच्चे का नाम स्कूल से कांटा भी नहीं जा सकता और उसको जिस कक्षा में वह पढ़ रहा है उस कक्षा के पूरे होने के बाद उसे अगली कक्षा में प्रमोट किया जाना चाहिए।

कई बार डीसी जालंधर से भी इस बारे में बात करनी चाही लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। वह चाहे तो अपना पक्ष हमें भेज सकते हैं। एनसीपीसीआर  ने जालंधर डीसी को चिट्ठी भेजी थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि बच्चे का स्कूल से नाम क्यों काटा गया। उसका 10 दिनों में जवाब देना था । अभी तक प्रशासन की तरफ से इसको नजरअंदाज किया गया। और स्कूल प्रिंसिपल गिरीश कुमार  कौन से रूल और कौन से आर्डर को फॉलो करते हुए पेरेंट्स को चिट्टियां भेज रहे हैं ।शायद प्रिंसिपल गिरीश कुमार को आरटीआई कानून के बारे में जरूरी जानकारी का भी नहीं पता और डीईओ और प्रिंसिपल गिरीश कुमार दोनों को  पता नहीं है आरटीआई कानून के बारे में क्योंकि जो प्राइवेट स्कूल हैं वह आरटीआई कानून को  कितना फॉलोअप करते हैं इसके बारे में स्कूल के नोटिस बोर्ड पर परमानेंट लिखा होना चाहिए और यह बोर्ड स्कूल के अंदर लगा होना चाहिए अगर यह बोर्ड एपीजे स्कूल के अंदर लगा होता तो यह बात उनको याद रहती है।  इस बारे में  प्रशासन ने जवाब दे दिया गया अभी देना बाकी है इस बारे में डी ई ओ हरेंद्र पाल ने बताया कि हमारे पास कोई चिट्ठी नहीं आई इसका मतलब प्रशासन अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर बैठा था और बच्चे के साथ हो रही डिस्क्रिमिनेशन को देखकर जा रहा था अभी तक यही नहीं समझ आ रहा कि उस बच्चे को इंसाफ दिलाने के लिए कौन सा अफसर अपनी जिम्मेवारी समझते हुए आगे आ रहे थे।

2016 का शिक्षा कानून मे Amendment करके 2019 का जो कानून है उसमें डिविजनल कमिश्नर को पूरी पावर दी गई है इसके बाद भी जालंधर के  इस बच्चे को अभी तक इंसाफ नहीं मिला

डीसी साहब जो मुख्य अधिकारी हैं जिनके पास मजिस्ट्रेट की भी पावर है और अब सारी पावर होने के बाद भी बच्चे को इंसाफ नहीं मिला। डीसी साहब की डायरेक्शन पर ही बच्चे का साइकेट्रिक टेस्ट कराया गया क्यों???- यह एक बहुत बड़ा सवाल है।  यह इसके अलावा भी बहुत से सवाल हैं ।त्रपर इनका जवाब कौन देगा,  क्योंकि डीसी साहब तो चुप्पी साध बैठे हैं , वह अपने मुंह पर कोविड-19 का मास्क लगाकर कर बैठे हैं उसके ऊपर चुप्पी ही साद बैठे हैं यह बच्चे के भविष्य की बात है । हम यह समझते हैं यह बच्चा गगनप्रीत सिंह का नहीं है यह बच्चा डीसी जालंधर और डीईओ जालंधर का भी है। इस बच्चे को इंसाफ दिलाने के लिए डीसी साहब किस लेवल तक जाते है कब तक कार्रवाई करते हैं और क्या कार्रवाई करते हैं क्या डीसी साहब इस स्कूल की एनओसी रद्द करेंगे ?  स्कूल को सील करने के लिए आगे जाएंगे ?;क्योंकि यह स्कूल तो पहले से ही विवादों के घेरे में है । इसको शो- काज नोटिस शिक्षा मंत्री की ओर से भी जारी हो चुका है।  शिक्षा मंत्री ने हिदायत दी थी कि इनकी एनओसी रद्द की जाए।शिक्षा के मामले को लेकर शो कॉज नोटिस इशू हो गया । शो कॉज नोटिस इशू होने के बाद क्या लॉक डाउन के बाद यह स्कूल खुलेगा? या नहीं खुलेगा?

शिक्षा मंत्री जी ने इस पर क्या कार्रवाई की ? या अदर में छोड़ दिया क्या डीसी और डी ई ओ जालंधर किसी स्कूल की एन ओ सी रद्द कर और स्कूल पर  कार्रवाई कर बच्चे को इंसाफ दिला पाएंगे यह सवाल जनता की कचहरी में है।   जनता और उनके मां-बाप जयवीर सिंह को इंसाफ दिलाने के लिए निकलेंगे हम सभी को आह्वान करते हैं इस बच्चे की मदद करने के लिए आगे निकले

शिक्षा के मामले को लेकर शो कॉज नोटिस इशू हो गया नाम काटने के लिए भी यह स्कूल विवादों के घेरे में है

कई बार कॉल करने के बाद भी डीसी जालंधर और एडीसी जालंधर ने कोई जवाब नहीं दिया उसके बाद डि ईओ जालंधर ने भी कोई जवाब नहीं दिया । जब भी इनका कोई जवाब आएगा आपके सामने पेश किया जाएगा । डीसी साहब, DEO जालंधर ,एडीसी और एपीजे स्कूल  प्रिंसिपल हरीश को कई बार फोन करने के बाद और मैसेज करने के बाद भी कोई जवाब नहीं आया। खबर छापने तक उनका कोई जवाब हमें नहीं मिला। ना ही मैसेज का कोई रिप्लाई आया। समाचार आज तक शिक्षा के मुद्दे को लगातार छापता रहेगा। कई बार फोन करने के बाद जब DEO जालंधर हरेंद्र पाल सिंह से बात हुई तो उन्होंने यह मान लिया था कि बच्चे का नाम फीस ना देने की वजह से काट लिया जा सकता है।  लेकिन जब हमने उनसे इस ऑर्डर की कॉपी मांगी तो खुद ही अपनी बात से मुकर गए । उन्होंने कहा मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता सवाल यह उठता है । और डियो जालंधर से जब दोबारा सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं लीगल एडवाइज लेकर ही मीडिया को कोई जवाब दे पाऊंगा अगर यह लीगल एडवाइस पहले ही दिए हो जालंधर नहीं ले ली होती तो आज यह बच्चा जय वीर सिंह जो एपीजे स्कूल से फीस ना देने की वजह से निकाला गया, आज स्कूल में पढ़ रहा होता। डि ईओ जालंधर शिक्षा विभाग की तीन लीगल कमेटी के मेंबर हैं। जिस कुर्सी पर यह बैठे हैं यहां पर हर मां-बाप को जस्टिस की उम्मीद होती है ।क्योंकि यह ऑफिसर हर डिसीजन ले सकते हैं फिर भी इनको लीगल एडवाइस की जरूरत पड़ रही है। वह भी एक मीडिया को छोटा सा बयान देने के लिए।

सवालों के कटहरे के घेरे में डीईओ जालंधर भी आते हैं। जो कि खुद ही अपनी बात से मुकर गए स्कूल और प्रशासन दोनों ही इस बच्चे को अंधकार की ओर धकेल रहे हैं ।

हमारी सभी पेरेंट्स से गुजारिश है कि अगर कोई भी पेरेंट्स अपनी बात रखना चाहता है तो नीचे दिए गए नंबर पर बता सकता है । विद एविडेंस उसकी खबर पहल के आधार पर जरूर छापी जाएगी 7009604964
smacharaajtak.com

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