किसानों के साथ एक और गड़बड़झाला, दिसंबर में पंजीकृत हुई संस्थाएं बिल के समर्थन में कृषि मंत्री को ज्ञापन दे रही,

कृषि कानूनों के समर्थन में कहां कहां से संगठनों का जुगाड़ कर रही है सरकार

पत्रकार रवीश  ने अपने प्राइम टाइम में लिखा है:

अगर आप अकेले या कुछ दोस्तों के साथ कृषि मंत्री के साथ फोटो खिंचाना चाहते हैं और चाहते हैं कि कृषि मंत्री उस तस्वीर को ट्विट करें जिसे कई न्यूज़ चैनल कवर करने लगें तो यह कोई असंभव काम नहीं है। आप एक काम करें। एक संगठन बनाएं। उसके नाम के आगे पीछे किसान लिख दें। फिर एक पत्र लिखें और उन्हें अपने दोस्तों के साथ दे आएं। कहें कि आप कृषि कानूनों को समर्थन करते हैं। बैठे बैठे आपको कृषि मंत्री के साथ अपनी व्हाट्स एप डीपी के लिए फोटो मिल जाएगा।

ऐसा न कहें तो कैसा कहें। अब आप ही बताइये। 20 दिसंबर को हिन्द मज़दूर किसान समिति नाम की एक संस्था के सदस्य कृषि मंत्री से मिलते है। कृषि मंत्री ट्विट करते हैं कि इन लोगों ने कृषि कानूनों का समर्थन किया है। जबकि यह संस्था दिसंबर में ही पंजीकृत हुई है। खुद संस्था के सदस्य कहते हैं कि किसान आंदोलन चल रहा था तो उस दौरान समिति का पंजीकरण कराया। ये उनके ही शब्द हैं कि “समिति के रुप में संस्था पहले भी काम कर रही थी लेकिन जब किसानों की समस्याओं का कोई हल नहीं किया तो उन्हें दिखाई दिया कि किसानों का अहित हो रहा है तो तब हमें ये अभी दिसंबर 2020 में इस समिति को रजिस्टर कराया और बिल के समर्थन में कृषि मंत्री को ज्ञापन दिया।”

अब इसमें एक और गड़बड़झाला है[ समिति के सदस्य कहते हैं कि उन्होंने समर्थन के अलावा कुछ मांगे भी रखीं कि गन्ना की खरीद टाइम से हो ताकि खेती खाली हो सकें और गेहूं की बुवाई समय से हो सके। 10 साल बाद ट्रैक्टर के इस्तमाल न करने का कानून बदला जाए। समिति के नेता के अनुसार कृषि मंत्री ने आश्वासन दिया कि इसके बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। लेकिन ये सब जानकारी तो कृषि मंत्री ने भी नहीं दी। सिर्फ इतना कहा कि किसान बिल का समर्थन किया है।

अब आप समझिए। अगर सरकार सत्य के साथ होती तो ऐसे संगठनों का सहारा क्यों लेती? वो भी ऐसी संस्था जो बनी है उसी महीने में और समर्थन करने भी पहुंच गई।
जिस तरह से समर्थन की तस्वीरें ट्विट हो रही हैं उससे तो यही लगता है कि देश भर से ऐसे संगठन की खोज हो रही है। जिन्हें समर्थन के लिए सामने लाया जा सके। लेकिन सरकार को ऐसी बातों का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है जिनसे फर्ज़ीवाड़े की बू आती है। इससे तो किसानों का ही संदेह मज़बूत होता है कि यह बिल किसानों के लिए नहीं है। किनके लिए है? ये तो आप जानते ही हैं।

 

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